अयोध्या के नागेश्वर नाथ की महानता अकल्पनीय और अविश्वसनीय, जाने पूरी कहानी  

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अयोध्या का नागेश्वरनाथ मंदिर देश के 108 शिवालयों में से एक है। सरयू तट पर स्थित यह मंदिर दिव्य और भव्य है। भगवान श्री राम के पुत्र कुश ने सरयू तट पर नागेश्वरनाथ की स्थापना की थी। पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव नागों की रक्षा के लिए यहां प्रकट हुए थे, जिसके कारण भगवान शिव नागेश्वर रूप में विराजमान है। भक्त उन्हें नागेश्वर नाथ के रूप में पूजते है।

भक्तों के आस्था का बड़ा  केंद्र 

सरयू की अविरल धारा के समीप भगवान शिव का यह शिवालय नागेश्वरनाथ असंख्य शिव भक्तों की आस्था, विश्वास और श्रद्धा बड़ा केंद्र है। सावन मास, मलमास, शिवरात्रि भगवान का जलाभिषेक के लिए लाखों भक्त यहां पहुंचते है। शिवालय में भगवान शिव के पूजन और अभिषेक से व्यक्ति की सभी कामनाएं पूरी होती हैं।

राम ने अयोध्या को आठ भागों में था बांटा 

विद्वानों के अनुसार भगवान श्रीराम अनंत धाम जाने से पूर्व अयोध्या राज्य को आठ भागों में बांट दिया गया था। भरत के पुत्र पुष्कल और मणिभद्र लक्ष्मण के पुत्र अंगद और सुबाहु और शत्रुघ्न के पुत्र नील और भद्रसेन और अपने पुत्र लव और कुश को अवध के राजकाज को समान भागों में बांट दिया था। इसमें कुश को कौशांबी का राज्य मिला। एक रात कुश ने स्वप्न देखा, जिसमें अयोध्या नगरी उनसे कह रही थी, कि भगवान श्रीराम के अनंत धाम जाने के बाद मेरी स्थित पूर्व की भांति नहीं रह गई।

अयोध्या स्थित नागेश्वर नाथ मंदिर

अयोध्या की जिम्मेदारी हनुमानजी को सौंपी गई थी। लेकिन, वे अपने स्वामी की गद्दी पर बैठना अनुचित मानते हैं। इस कारण आप आकर अयोध्या पर शासन करें। इस स्वप्न के आधार पर कुश अयोध्या आकर इसे  अपनी राजधानी बनाकर रहने लगे। अयोध्या में निवास करते समय कुश ने भगवान शिव से यह अनुरोध किया कि वे स्वयं यहां निवास करें। जिसके बाद भगवान स्वयं सरयू तट पर प्रकट हुए और नागेश्वर नाथ के रूप में स्थापित हुए।

भगवान ने स्वयं प्रकट होकर युद्ध को रुकवाया

शिव पुराण के एक आलेख के अनुसार, एक बार नौका विहार करते समय उनके हाथ का कंगन सरयू में गिर गया। कंगन सरयू में वास करने वाले कुमुद नाग की पुत्री के पास गिरा। यह कंगन वापस लेने के लिए राजा कुश और नाग कुमुद के बीच घोर संग्राम हुआ। जब नाग को यह लगा कि वह यहां पराजित हो जाएंगे, तो उन्होंने भगवान शिव का ध्यान किया। भगवान ने स्वयं प्रकट होकर युद्ध को रुकवाया। कुमुद ने कंगन देने के साथ भगवान शिव से यह अनुरोध है कि उनकी पुत्री कुमुदिनी का विवाह कुश के साथ करवा दें।

कुश ने इसे स्वीकार किया और भगवान शिव से यह अनुरोध किया कि वे स्वयं यहां निवास करें। भगवान शिव ने उनकी इस याचना को स्वीकार कर लिया। नागों के ध्यान (रक्षा करने के लिए) करने पर भगवान शिव प्रकट हुए थे। इस कारण इसे नागेश्वर नाथ के नाम से जाना जाता है। इसके बाद राजा कुश ने अयोध्या में नागेश्वर नाथ मंदिर की स्थापना की। कुश द्वारा मंदिर के मुख्य द्वार पर एक शिलालेख लगवाया गया था, जो इस समय नष्ट हो चुका है।

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